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Poetry (Hindi-Urdu)

दर-ब-दर

दर-ब-दर जो भटकती रही उम्र-भर
जब हुआ खत्म उसका जहां में सफर
किसी मस्जिद की चौखट पे थी वो मिली
फूल मुरझा के भी वो मुरझाया न था
नूर ऐसा था जैसे सहर की कली
रंग उजला न था पर थी पाकीज़गी
नील अंबर सी चादर में लिपटी पड़ी
कई बेनाम शामों सी ढल वो गई
शाम सी ढल गई जो कभी थी सुबह
दयार-ए-काफ़िर में रिश्तों से जकड़ी हुई
एक गुमनाम जीवन वो जीती रही
उसकी क्या गलती थी क्या था उसका गुनाह
क्यों वो तपती रही क्यों पिघलती रही
गर नहीं चाहा उसने दिखाना जहां को
कितना खूबसूरत खा़लिक़ ने बनाया था उसको
क्यों अपनों के कदम पीछे हटने लगे
उसके पर्दे पर उंगलियां क्यो उठने लगी
फ़ज्र ज़ुहर अस्र मग़रिब इशा की अज़ान
सब वो सुनती रही पर न कुछ कर सकी
उन पलों में कैसे हर पल वो घुटती रही
आँसू भी तो न सकती थी वो दिखा
झूठी मुस्कुराहट से सिलकर वो होंठ
बस सिसकती रही बस सिसकती रही
कौन अंसार है आज के दौर में
उस‌ मुहाजिर को क्यों कोई देता बसर
दर-ब-दर वो भटकती रही उम्र भर
जब हुआ खत्म उसका जहां में सफर
किसी मस्जिद की चौखट पे थी वो मिली

© Muntazir
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4 replies on “दर-ब-दर”

ओह,मुन्तजिर ज़नाब!!आखिर कौन थी वो पाकीजा मुहाजिर? मैं हैरान और परेशान हो गयी हूं उसका ख्याल करके-एक भिखारिन/एक पाक पर नाक़ामयाब मुहब्बत/या कोई परदेसन । आखिर कौन थी वो?म़ेहरबानी करके बताईये।

बिल्कुल सही फ़रमाया है आपने”……कौन अंसार है आज के दौर में,उस मुहाजिर को कौन देता बस……”,पर फिर वही ख्याल-आखिर वो कौन थी???????

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