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Poetry (Hindi-Urdu)

फिर हवाओं में

फिर हवाओं में वही आवाज़ सुनाई देती है
वही आवाज़ जो भीड़ में भी तन्हाई देती है

जैसे बुझने से पहले लौ कुछ तेज़ दहकती है
कि ज़मीं पर गिरती पत्तियां अंगड़ाई लेती हैं

निकहत तो आती है‌ हवा के हल्के झोंकों से
आंधी बस चमन-ओ-बाग़ तबाह कर देती है

चमकते सूरज की गर्मी से उसका क्या लेना
वो तो लाश-सी किसी मदफ़न में लेटी है

सुनसान गलियां डरा देती हैं आज भी उसे
हर चीख़ में उसे अपनी चीख़ सुनाई देती है


پھر ہواؤں میں وہی آواز سنائی دیتی ہے
وہی آواز جو بھیڑ میں بھی تنہائی دیتی ہے

جیسے بجھنے سے پہلے لو کچھ تیز دہکتی ہے
کی زمیں پر گرتی پتیاں انگڑائی لیتی ہیں

نکہت تو آتی ہے ہوا کے ہلکے جھونکوں سے
آندھی بس چمن-او-باغ تباہ کر دیتی ہے

چمکتے سورج کی گرمی سے اسکا کیا لینا
وہ تو لاش-سی کسی مدفن میں لیتی ہے

سنسان گلیاں ڈرا دیتی ہیں آج بھی اسے
ہر چیخ میں اس اپنی چیخ سنائی دیتی ہے


© Muntazir
Picture Credit

3 replies on “फिर हवाओं में”

माशा अल्लाह बेहद खूबसूरत नज़्म है कुछ कुछ गमज़दा सी,हाँ कुछ आवाजें ऐसी भी होती हैं जो तन्हाई में भी खँजर बन दिल को दहला जाती हैं।कौन है वो नामुराद जो पीछा ही नहीं छोड़ता।very well written and heart touching.

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