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Poetry (Hindi-Urdu)

मंज़र ए इमरोज़

मंज़र ए इमरोज़ में क्या कोई अंसार नहीं है
क्यों यहां बशरियत का कोई दीदार नहीं है

दर ए तौबा ख़ाली और शहवत ख़ानों में भीड़
पर कमाल यहां कोई गुनहगार नहीं है

जमियत ए मोमिन माशाअल्लाह बरक़रार है
हाशिए पर है पर हाशिया बरदार नहीं है

हक़ है हिदायत है ज़रिया ए नूर कुरआन
अल्लाह से इलहाम है सिरिशतादार नहीं है

बर वक्त थाम लो पकड़ लो रसन ए ख़ुदा
अब्द ए अल्लाह के लिए अज़ाब अन्नार नहीं है


منظر امروز میں کیا کوئی انصار نہیں ہے
کیوں یہاں بشریت کا کوئی دیدار نہیں ہے

درے توبہ خالی اور شہوت خانوں میں بھیڑ
پر کمال یہاں کوئی گنہگار نہیں ہے

جمعیت اے مومن ماشاءاللہ برقرار ہے
حاشیے پر ہے پر حاشیہ بردار نہیں ہے

حق ہے ہدایت ہے ذریعہ اے نور قرآن
اللہ سے الہام ہے سرشتہ دار نہیں ہے

بروقت تھام لو پکڑ لو رسنے خدا
عبد اللہ کے لیے عذاب النار نہیں ہے


© Muntazir
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ऐ क़ल्ब ए मुज़्तर

ऐ क़ल्ब ए मुज़्तर ओ ज़ेहन ए परेशां
इस बयाबाँ से आगे है एक चमनिस्तां

ग़ुबार ए आह कब तक तेरा साज़ रहेंगी
हवाएं सुन आज बनी हैं हुदा ख़्वाँ

अल अर्श पर बैठे वो ‌अल ग़फ़ूर हैं
फिर देर किस बात की तू हो जा पशेमां

जौलाँ ए फ़ित्नातिल महया को तोड़ दे
आने वाला है माह ए पाक ए क़ुर्बां

ताइर ए उन्स उड़ने को बेताब सदियों से
फ़िजा ए क़ल्ब खोल के चल बन जाए इंसां


اے قلب مُضطر و ذہن پریشاں
اس بیاباں سے آگے ہے ایک چمنِستاں

غُبار آہ کب تک تیرا ساز رہینگے
ہوایں سُن آج بنی ہیں خدا خواں

ال عرش پر بیٹھے وہ الغفور ہیں
پھر دیر کس بات کی تو ہو جا پشیماں

جولاں فِتناتِل محیا کو چھوڑ دے
آنے والا ہے ماہ پاک قرباں

طائر اُنس اڑنے کو بیتاب صدیوں سے
فضا قلب کھول دیں چل بن جاۓ اِنساں


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नज़रें टिकी हैं

नज़रें टिकी हैं नीले आसमान में,
मुलायम रूई से सफ़ेद बादल
उड़ते चले जाते हैं,
एक अजीब सी उलझन है, सुकून भी है,
आवाज़ें दस्तक दे रही हैं
दिल के दरवाज़े पर
और मन की गलियों में सन्नाटा भी है,
नीले आसमान में गुम हो गए बीते लम्हों को
इक बार फिर पढ़ने का मन करता है
पर नज़रें रुक नहीं पातीं,
बार बार मुड़ जाती हैं मस्जिद की ओर,
मीनार पर बैठा कबूतर कुछ कह रहा है,
उसके कहने में शोर नहीं है,
न शब्द हैं, न आवाज़


نظریں ٹِکی ہیں نیلے آسمان میں
مُلائم رُوئ سے سفید بادل
اُڑتے چلے جاتے ہیں
ایک عجیب سی اُلجھن ہے، سُکون بھی ہے
آوازیں دستک دے رہی ہیں
دِل کے دروازے پر
اور من کی گلِیوں میں سنّاٹا بھی ہے
نیلے آسمان میں گُم ہو گئے بیتے لمحوں کو
اِک بار پھِر پڑھنے کا من کرتا ہے
پر نظریں رُک نہیں پاتیں
بار بار مُڑ جاتی ہیں مسجِد کی اور
مینار پر بیٹھا کبوتر کُچھ کہ رہا ہے
اُسکے کہنے میں شور نہیں ہے
نہ شبد ہیں، نہ آواز


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ख़ुद को ख़ुद की

ख़ुद को ख़ुद की गिरहों से आज़ाद किया
आज हमने भी ख़ुद को आबाद किया

क़फ़स ए ज़माने से रिहा कर ही दिया
और कुछ यूं ख़ुद को बर्बाद किया

जब कभी चस्म ए नम हुई महफ़िल ए तन्हाई
ख़ुदा ने नेमतों से अपनी बज़्म शाद किया

सफ़र में जब भी दिन ढला जब भी रात हुई
आयते सब्र ओ तवक्कुल को हम ने याद किया

आपकी रहमतें हम पर रही सदा या रब
हर तूफां को आप ने रूहानी बाद किया


خود کو خود کی گرہوں سے آزاد کِیا
آج ہمنے بھی خود کو آباد کِیا

قفس زمانے سے رِہا کر ہی دِیا
اور کُپھ یوں خود کو برباد کِیا

جب کبھی چشم نم ہوئی محفِل تنہائی
خُدا نے نعمتوں سے اپنی بزم شاد کیا

سفر میں جب بھی دِن ڈھلا جب بھی رات ہوئی
آیتیں صبرو توکُّل کو ہم نے یاد کیا

آپکی رحمتیں ہم پر رہیں سدا یا رب
ہر طوفاں کو آپ نے روحانی بات کیا


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रौशनी भी आप

रोशनी भी आप हैं उजाला भी आप
ढलती हुई शाम का सहारा भी आप

हम सभी अब्द तो नादान हैं‌ फ़कत
हक़ रास्ता दिखाए वो इशारा भी आप

बंजर ज़मीन है दरारों से है भरी
हर ज़ख्म हरा करदे वो बहारा भी आप

अल-ख़ालिक हर शय हर जहां है आपका
इलाही नाज़िर भी आप हैं नज़ारा भी आप

मुसाफिर हैं इस सफ़र में हम सभी
मंजिल भी आप हैं दवारा भी आप

कश्ती हमें आप तक पहुंचाएगी ज़रूर
दरिया भी आप हैं किनारा भी आप


روشنی بھی آپ ہیں اُجالا بھی آپ
ڈھلتی ہوئی شام کا سہارا بھی آپ

ہم سبھی ابد تو نادان ہیں فقط
حق راستہ دِکھائے وہ اِشارہ بھی آپ

بنجر زمین ہے دراروں سی ہے بھری
ہر زخم ہرا کردے وہ بہارا بھی آپ

الخالِق ہر شی ہر جہاں ہے آپکا
اِلاہی ناظِر بھی آپ ہیں نظارہ بھی آپ

مُسافِر ہیں اِس سفر میں ہم سبھی
منظِل بھی آپ ہیں دوارہ بھی آپ

کشتی ہمیں آپ تک پہُنچائےگی ضرور
درِیا بھی آپ ہیں کِنارہ بھی آپ


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माह-ए-बरकत

माह-ए-बरकत है
किस बात की ग़ुर्बत है
दुआ में हाथ उठे हैं
अल्लाह की रहमत है

सजदे में सर झुके हैं
इबादत भरी शबे हैं
भीगे हैं अब्द सारे
हर बूंद नेमतें हैं

क़ुरआन के हर पारे
में हैं सवाब धारे
अल्लाह अल-ग़फ़ूर हैं
कर लो सभी कफ़्फ़ारे


ماہِ برکت ہے
کِس بات کی غُربت ہے
دُعا میں ہاتھ اُٹھے ہیں
اللہ کی رحمت ہے

سجدے میں سر جُھکے ہیں
عِبادت بھری شبیں ہیں
بھیگے ہیں ابر سارے
ہر بوند نعمتیں ہیں

قرآن کے ہر پارے
میں ہیں ثواب دھارے
اللہ ال-غفور ہیں
کرلو سبھی کفّارے


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सहर को शब

सहर को शब समझ सो जाना क़ुसूर हो गया
इंसान को जगाना अब ज़रूर हो गया

पत्थर कई रातों से जिस राह पड़ा था
एक अनजान ठोकर से आज चूर हो गया

सुना‌ है कि खुदाई में ईमान मिला है
क्या इंसान ख़ुदा से इतना दूर हो गया

धूल की परतों के नीचे भूली पड़ी कुरआन
दुनियावी शय से मकान ओ घर माअमूर हो गया

उन्होंने सदियां बितादी बुत-ख़ाने में
हम काबे की ओर चलें तो शूर हो गया

सूखे शजर के पत्ते-से बिखरे हुए थे हम
जो पढ़ी आयत-ए-कुरआन रुख़ पे नूर हो गया

बेचैन गिरहों में गिरफ्तार क़ल्ब था
हक़ रौशनी में आके दिल सुबूर हो गया


سحر کو شب سمجھ سو جانا قصور حو گیا
انسان کو جگانا اب زرور حو گیا

پتّھر کئ راتوں سے جس راہ پڑا تھا
اک انجان ٹھوکر سے آج چور حو گیا

سنا ہے ک کھدائی میں ایمان ملا ہے
کیا انسان خدا سے اتنا دور حو گیا

دھول کی پرتوں کے نیچے بھولی پڑی قرآن
دنیاوی شے سے مکان و گھر مامور ہو گیا

انہوں نے سدیاں بتاری بت خانے میں
حم کعبے کی اور چلے تو شور حو گیا

سوکھے شجر کے پتّے سے بکھرے ہوئے تھے ہم
حو پڑھی آیتیں قرآن رُخ پے نور حو گیا

بےچین گرہوں میں گرفتار قلب تھا
حق روشنی میں آکے دل صبور ہو گیا

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अश‌आर

क़ासिद किस पते पर लाएगा ख़त मेरा
मेरे घर ने मुझे बाहरी एलान कर दिया

قاصد کس پتے پر لائیگا خط میرا
میرے گھر نے مجھے باہری اعلان کر دیا

सांझ में सहर को उसने सदा दी थी ख़ता की थी
साफ़ लफ़्ज़ों में उसने ख़ामियां अपनी बता दी थी

سانجھ میں سحر کو اُسنے صدا دی تھی خطا کی تھی
صاف لفظوں میں اسنے خامیاں اپنی بتا دی تھی

ए बशर देखते हो क्या निगाह-ए-मुतजसस यूं तुम
तुम्हारा ही कफ़न तैयार तो शह-ज़ोर करते हैं

اے بشر دیکھتے ہو کیا نگاہیں متجسس یوں تم
تمہارا ہی کفن تیار تو شہ-زور کرتے ہیں

फ़क़त चाहने से होता यहां कुछ भी नहीं
न चाहते हुए भी आंसू छलक जाते हैं

فقط چاہنے سے ہوتا یہاں کچھ بھی نہیں
ن چاہتے ہوئے بھی آنسو چھلک جاتے ہیں

 

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है कौन सा

है कौन सा सुकून जो इबादत से बड़ा है
उससे ज्यादा खुश है कौन जो मस्जिद में खड़ा है

कुरआन का हर लफ्ज़ इक अनमोल तोहफा है
इससे कीमती अल्मास कहां धरती में गड़ा है

सजदे से उठा है अभी वो अब्द अल्लाह का
नमाज़ के हर निशान में कैसा नूर जड़ा है

कितना पाक ओ ताहिर कितना नेक है वो दिल
जो दूसरों के ग़म में रो बच्चे सा पड़ा है


ہی کونسا سکون جو عبادت سے بڑا ہے
اسسے زیادہ خش ہے کون جو مسجد میں کھڑا ہے

قرآن کا ہر لفظ ایک انمول تحفہ ہے
اسسے قیمتی الماس کہاں دھرتی میں گڑا ہے

سجدے سے اٹھا ہی ابھی وہ ابد اللہ کا
نماز کے ہر نشان میں کیسا نور جڑا ہے

کتنا پاک او طاہر کتنا نیک ہے وہ دل
جو دوسروں کے غم میں رو بچّی سا پڑا ہے

 

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नफ़रत के सभी

नफ़रत के सभी फूल बे-मौसम ही झड़ गए
मुनफ़िक़ों के आशियाने बस कर भी उजड़ गए

हक़ बात सुनकर जो मुंह मोड़ लेते थे
सतून उनके घरों के एक-एक कर उखड़ गए

हमने तो बस ज़िक्र-ए-हश्र किया था
न जाने उनके मिज़ाज क्यों बिगड़ गए

नेमतें ख़ुदा से इतनी मिली
कि गिनने बैठे तो तारे कम पड़ गए


نفرت کے سبھی پھول بے موسم ہی جھڑ گئے
منفقوں کے آشیانے بس کر بھی اجڑ گئے

حق بات سنکر جو منہ موڑ لیتے تھے
ستون انکے گھروں کے ایک ایک کر اکھڑ گئے

ہمنے تو بس ذکرے حشر کیا تھا
نا جانے انکے مزاج کیوں بگڑ گئے

نعتیں خدا سے اتنی ملی
کی گننے بیٹھے تو تارے کم پڑ گ

© Muntazir
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