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Poetry (Hindi-Urdu)

दर-ब-दर

दर-ब-दर जो भटकती रही उम्र-भर
जब हुआ खत्म उसका जहां में सफर
किसी मस्जिद की चौखट पे थी वो मिली
फूल मुरझा के भी वो मुरझाया न था
नूर ऐसा था जैसे सहर की कली
रंग उजला न था पर थी पाकीज़गी
नील अंबर सी चादर में लिपटी पड़ी
कई बेनाम शामों सी ढल वो गई
शाम सी ढल गई जो कभी थी सुबह
दयार-ए-काफ़िर में रिश्तों से जकड़ी हुई
एक गुमनाम जीवन वो जीती रही
उसकी क्या गलती थी क्या था उसका गुनाह
क्यों वो तपती रही क्यों पिघलती रही
गर नहीं चाहा उसने दिखाना जहां को
कितना खूबसूरत खा़लिक़ ने बनाया था उसको
क्यों अपनों के कदम पीछे हटने लगे
उसके पर्दे पर उंगलियां क्यो उठने लगी
फ़ज्र ज़ुहर अस्र मग़रिब इशा की अज़ान
सब वो सुनती रही पर न कुछ कर सकी
उन पलों में कैसे हर पल वो घुटती रही
आँसू भी तो न सकती थी वो दिखा
झूठी मुस्कुराहट से सिलकर वो होंठ
बस सिसकती रही बस सिसकती रही
कौन अंसार है आज के दौर में
उस‌ मुहाजिर को क्यों कोई देता बसर
दर-ब-दर वो भटकती रही उम्र भर
जब हुआ खत्म उसका जहां में सफर
किसी मस्जिद की चौखट पे थी वो मिली

© Muntazir
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Poetry (Hindi-Urdu)

शजर-ए-दुनिया

ये रात गुज़र जाएगी कल कौन जाने
उम्र के बाकी हैं कितने पल कौन जाने

कैफ़िय्यत-ए-हयात-ओ-नफ्स ताहिर हो
उल्फ़त-ए-दुनिया है तिलिस्म हल कौन जाने

आफताब बन सको तो रौशन है ज़माना
पराई चमक पर माहताब का बल कौन जाने

नील-सा निकलो जो बयाबां से तो बात भी है
वगर्ना वीरानों में सूखे पड़े नल कौन जाने

मुहब्बत पाकीज़ा वही है जो ख़ुदा से हो
इश्क़ की आग में जलना है तो जल कौन जाने

शुआ-ए-ज़र-ओ-आस ज़िक्र-ए-अल्लाह से है
शजर-ए-दुनिया में क्या रखा है फल कौन जाने

हर गाम पर फ़रेब है इस सफर में मुसाफिर
फितरत है मुनाफ़िक़ का छल कौन जाने

एक कैद है दुनिया ये मरसिया है जिंदगी
सजी है बिखरे अशआरो से ग़ज़ल कौन जाने

© Muntazir
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Poetry (Hindi-Urdu)

काली स्याही से

काली स्याही से मंज़र में खून के छींटे
रात है लेकिन बहना भी ज़रूरी है

फीके उजियालों तक के नाकाम सफर में
संग कौन है जाने क्या कितनी दूरी है

ग़ैर-मुमकिन तो नहीं मैं डूब जाऊं
दास्तां मेरी अधूरी थी अधूरी है

धुआं धुआं हसरतें उड़ने लगी हैं जा-ब-जा
शबिस्तां में मुस्कुराना इक मजबूरी है

माहताब मुंतज़िर है सितारों का
मेरी शब-ओ-शाम बिन जुगनू ही पूरी है

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Poetry (Hindi-Urdu)

पशेमां सी इक लड़की

पशेमां सी इक लड़की
किसी क़ब्र किनारे बैठी है
आहिस्ता आहिस्ता
बंद धड़कनों को सुनती है
तदबीरें सब खो सी गई हैं
मुनसिफ एक मुनाफ़िक़ है
सारी ज़मीं ही मक़्तल है
अब कौन यहां पर हाफिज है
दाइम कर्ब-ए-मुसलसल है
खुशियों की ख़लल है कभी-कभी
सिसकियां जनाब यहां हैं ख़ू
बरसों से दफ़्न ताइर-ए-सुकून

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Poetry (English)

O Son Of Adam

O son of Adam O daughter of Eve,
Open your eyes, dark paths now you leave.
Why are you treading on road so black?
It will lead you to thorns, this rose track.
Wake up. Oh Stand. It is still not late.
Be a believer. Come out of bait.

O son of Adam O daughter of Eve,
Open your eyes or else you will grieve.
Hold onto the words Lord has revealed.
Bathe in His mercy, wounds will get healed.
Pray Him alone, to whom you belong.
The Hour is truth and it is not long.

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Poetry (Hindi-Urdu)

रात अंधेरे में

रात अंधेरे में गर कोई ख्वाब देखो तो
बैठ जाना उठकर और दीपक जला लेना
रोशनी की लौ वो कोई गीत गाएगी
कुछ न कहना तुम बस उसको देखते रहना
स्याह पट्टे पर कलम उजली चले तो क्या मज़ा
आइना बनकर कलम काली उठा लेना

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Poetry (Hindi-Urdu)

हाशिए पर करवटें

हाशिए पर करवटें ले रही इक जान है
धुंधले आईनों से चमक उठने लगी है

टूटकर सितारे गर बिखर गए तो क्या हुआ
दहकते शोलों से चिंगारियां फिर उड़ने लगी हैं

अलाहिदा हो गई थीं जो क़ौमे किसी हिज्र में
एक बार फिर काबे की ओर मुड़ने लगी हैं

ये जब्र ओ कैद ओ बेड़ियां सब टूट जाएंगी
के बहर-ए-शबाब देखो कैसे जुड़ने लगी है

ये तड़प ओ आह ये चीखें जो सिसकती हैं जा-ब-जा
हाय अब चुप न रहेंगी कि कलम चलने लगी हैं

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Short Prose

A Sweet Escape

The cold breeze pricked her cheeks, making her shiver with pain. Reality is harsh. Sleep is a sweet escape. But the wind would not let her sleep. Like the snooze of an alarm it was constantly nagging her. She wanted to smack it hard on the ground and laugh at the shattered pieces. Atleast, she would not remain the only broken thing in the room. She had even started to enjoy the foolish thought, but the next icy blow slapped her hard, as if wreaking the vengeance.

She wanted to sleep. She was tired. It was a long day. A long hard day and she was tired, tired of doing nothing. She wanted to sleep. She had wanted to sleep the whole day, but sleep would just not listen. It seemed to her that sleep was sleeping herself. Was she too tired? Was she too in pain? If so, she would relieve her of it. She would caress her in a warm embrace and tell her that she was not alone. She would plant a light kiss on her forehead and fill her voids. She would even sing to her a lullaby in the same sweet voice she could hear now. Yes, exactly like this, this calm angelic voice. But, but whose is it? Whose hands are caressing her forehead? Who is snuggling her in this warm embrace? Whose baby is she becoming? She cannot see, her eyes are getting heavier, everything is getting fade fader…

© Muntazir
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Poetry (Hindi-Urdu)

कैद

अदम में कैद है जो पंछी
किस रुख में उड़ चले
वो जिसकी तलाश में है
वो कहकशां कहां है
जहां अदावते न थी
उसका वो घर कहां है
वहां क़श्के लहू के हैं
कि अब ताइर उड़े कैसे
उसके पंखों‌ को जिसने काटा
वो कफ़ अपने ही थे

© Muntazir
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Poetry (English)

A Song On Loop

Better is the upper hand which gives,
Than the one which takes.
Green and sweet is the wealth for him,
Whose heart is sans greed.

For when is greed ever quenched,
An eternally thirsty land.
A hollow without any bottom,
You fill it, but fill you never can.

The more they get, the more they wish,
Their cry for more never stops.
On loop this song plays in their mind,
Satisfied are never their hearts.

© Muntazir
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