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Poetry (Hindi-Urdu)

है कौन सा

है कौन सा सुकून जो इबादत से बड़ा है
उससे ज्यादा खुश है कौन जो मस्जिद में खड़ा है

कुरआन का हर लफ्ज़ इक अनमोल तोहफा है
इससे कीमती अल्मास कहां धरती में गड़ा है

सजदे से उठा है अभी वो अब्द अल्लाह का
नमाज़ के हर निशान में कैसा नूर जड़ा है

कितना पाक ओ ताहिर कितना नेक है वो दिल
जो दूसरों के ग़म में रो बच्चे सा पड़ा है


ہی کونسا سکون جو عبادت سے بڑا ہے
اسسے زیادہ خش ہے کون جو مسجد میں کھڑا ہے

قرآن کا ہر لفظ ایک انمول تحفہ ہے
اسسے قیمتی الماس کہاں دھرتی میں گڑا ہے

سجدے سے اٹھا ہی ابھی وہ ابد اللہ کا
نماز کے ہر نشان میں کیسا نور جڑا ہے

کتنا پاک او طاہر کتنا نیک ہے وہ دل
جو دوسروں کے غم میں رو بچّی سا پڑا ہے

 

© Muntazir
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Poetry (Hindi-Urdu)

नफ़रत के सभी

नफ़रत के सभी फूल बे-मौसम ही झड़ गए
मुनफ़िक़ों के आशियाने बस कर भी उजड़ गए

हक़ बात सुनकर जो मुंह मोड़ लेते थे
सतून उनके घरों के एक-एक कर उखड़ गए

हमने तो बस ज़िक्र-ए-हश्र किया था
न जाने उनके मिज़ाज क्यों बिगड़ गए

नेमतें ख़ुदा से इतनी मिली
कि गिनने बैठे तो तारे कम पड़ गए


نفرت کے سبھی پھول بے موسم ہی جھڑ گئے
منفقوں کے آشیانے بس کر بھی اجڑ گئے

حق بات سنکر جو منہ موڑ لیتے تھے
ستون انکے گھروں کے ایک ایک کر اکھڑ گئے

ہمنے تو بس ذکرے حشر کیا تھا
نا جانے انکے مزاج کیوں بگڑ گئے

نعتیں خدا سے اتنی ملی
کی گننے بیٹھے تو تارے کم پڑ گ

© Muntazir
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Poetry (Hindi-Urdu)

हम फ़ैज़ की नज़्में

आज़ाद वतन में आज़ादी का नारा फिर से गूंज रहा
सड़कों कूचों चौराहों पर बार इक फिर निकल हुजूम रहा
ये ज़मीं हमारा घर यहीं हम आशियां बनाएंगे
हम फ़ैज़ की नज़्में गाएंगे

है हक़ हमारा जो उसको तुम छीन नहीं हमसे सकते
वाबस्ता है जो हमसे वो कर दूर नहीं हमसे सकते
तुम ज़ोर लगा लो पूरा हम अपनी आवाज उठाएंगे
हम फ़ैज़ की नज्में गाएंगे

है ढला नहीं अब तक सूरज तुम रात नहीं ला पाओगे
तुमसे ऊपर एक गद्दी है कब तक यूं जुल्म बढ़ाओगे
हम हर एक मोड़ मकान बस्ती को शाहीन बाग़ बनाएंगे
हम फ़ैज़ की नज्में गाएंगे


آزاد وطن میں آزادی کا نعرہ پھر سے گونج رہا
سڑکوں کوچوں چوراہوں پر بار اک پھر نکل ہجوم رہا
یہ زمیں ہمارا گھر یہیں ہم آشیاں بنائینگے
ہم فیض کی نظمیں گائینگے

ہی حق ہمارا جو اسکو تم چھین نہیں ہمسے سکتے
وابستہ ہے جو ہمسے وہ کر دور نہیں ہمسے سکتے
تم زور لگالو پورا ہم اپنی آواز اٹھائینگے
ہم فیض کی نظمیں گائیںگے

ہی ڈھلا نہیں اب تک سورج تم رات نہیں لا پاؤگے
تم سے اوپر اک گدّی ہے کب تک یوں ظلم بڑھاؤگے
ہم ہر اک موڑ مکاں بستی کو شاہین باغ بنائینگے
ہما فیض کی نظمیں گاینگے


© Muntazir
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Poetry (English)

Saffron Masks

Your masks are falling down.
The paint is peeling off.
The saffron colour you used to hide
Your hideous inhuman desires
Behold is turning red,
Revealing your sick grim face
Smeared stained bespattered
With millions’ innocent blood.

Babies wrapped in white cloth
Beneath the palm trees,
Under your feet you crush them
Oh so mercilessly.
You swim in pools of blood.
How will you rinse it off your hands?
Oh butcherers of humanity
What is your vaulting ambition?

Smoke has filled the gardens,
Bodies float in black streams.
Random lines on a piece of paper
Daily change our identities.
Who are the purple hands to
Decide our name our place our fate?
Don’t you try to suppress us,
We stand together against you oh hypocrites.

© Muntazzir
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Poetry (Hindi-Urdu)

नमाज़

गूंजती है फिज़ा में जब फ़जर की अज़ान
पाक रूहानियत में गिरफ्तार हो जाता है जहान
ठंडी हवा जो बहती है हौले-हौले
हम तक पहुंचाती है खुशबू-ए-अमान

सारा जहां झुका लेता है सजदे में सर
फूल पत्ते नन्हीं चिड़िया नहर-ओ-शजर
हाथ उठ जाते हैं खुद-ब-खुद दुआ में
जुबां पर रहता है बस अस-समद का ज़िकर

कामों में उलझे इब्न-ए-आदम वफ़ूर
इस जहां की दौड़ में होने लगते हैं चूर
याद दिलाने कि सफर ये आख़रत का है
फैल जाता है मस्जिदों से अज़ान-ए-ज़ुहर का नूर

साथ झुकते हैं सर सारे उठते हैं हाथ
ज़िक्र होता है अल्लाह का दुरूद-ए-रसूल पाक
इस जहां की चमक में न खो जाए हम कहीं
दिखाती हैं‌ सिरातुल मुस्तकीम कुरआन की आयत

कभी फ़ुर्सत मिले तो पल-दो-पल को बैठ जाना
मूंदकर आंख छांह-ए-दरख़्त में ग़ाएबाना
अलसाई धूप की बाहों में खुद को खोकर
कभी सुनना क़ुदरत का पुर-अमन अफ़साना

बेदार होगे तब उस नींद से जो बरसों से थी
सलात-ए-अस्र में हो जाएंगी नम आंखें यूं हीं
सफर ये मुश्किल है हैं हम यहां जबतक मुसाफ़िर
सुजूद-ओ-क़ुनूत में है रियायत न और कहीं

सूखे लबों पे नाम अल्लाह सुभानअल्लाह
प्यासे हलक़ में प्यास अल्लाह सुभानअल्लाह
सहर से तिश्नगी में जिनकी थे सब भूल बैठे
सुन मग़रिब की अज़ान कहे हर जर्रा सुभानअल्लाह

वो सुकून आला है दुनिया के सुखों से सारे
सब्र-ओ-इबादत में सराबोर क़ल्ब-ए-गेहवारे
जो नज़दीक अल्लाह के सबसे ये है वो निकहत
हो जाते हैं ताहिर हर नफ्स जैसे गुल-पारे

ये दुनिया का फ़ल्सफ़ा यही है मरकज़-ए-हयात
बाद दिन के आनी ही है काली अंधेरी रात
न डर जाए कहीं रात से अब्द-ए-अल्लाह
अय्याम-ए-इशा लेकर आता है तबर्रुकात

शुक्र अल्लाह अर-रहमान अस-समी अल-बशीर
वो मालिक हैं सबके जहां-ओ-अख़ीर
हमें तौफ़ीक़ दें हिदायत-ओ-करम
हो रोज़-ए-हश्र में हिसाब या अल्लाह मुनीर

© Muntazir
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Poetry (Hindi-Urdu)

दर-ब-दर

दर-ब-दर जो भटकती रही उम्र-भर
जब हुआ खत्म उसका जहां में सफर
किसी मस्जिद की चौखट पे थी वो मिली
फूल मुरझा के भी वो मुरझाया न था
नूर ऐसा था जैसे सहर की कली
रंग उजला न था पर थी पाकीज़गी
नील अंबर सी चादर में लिपटी पड़ी
कई बेनाम शामों सी ढल वो गई
शाम सी ढल गई जो कभी थी सुबह
दयार-ए-काफ़िर में रिश्तों से जकड़ी हुई
एक गुमनाम जीवन वो जीती रही
उसकी क्या गलती थी क्या था उसका गुनाह
क्यों वो तपती रही क्यों पिघलती रही
गर नहीं चाहा उसने दिखाना जहां को
कितना खूबसूरत खा़लिक़ ने बनाया था उसको
क्यों अपनों के कदम पीछे हटने लगे
उसके पर्दे पर उंगलियां क्यो उठने लगी
फ़ज्र ज़ुहर अस्र मग़रिब इशा की अज़ान
सब वो सुनती रही पर न कुछ कर सकी
उन पलों में कैसे हर पल वो घुटती रही
आँसू भी तो न सकती थी वो दिखा
झूठी मुस्कुराहट से सिलकर वो होंठ
बस सिसकती रही बस सिसकती रही
कौन अंसार है आज के दौर में
उस‌ मुहाजिर को क्यों कोई देता बसर
दर-ब-दर वो भटकती रही उम्र भर
जब हुआ खत्म उसका जहां में सफर
किसी मस्जिद की चौखट पे थी वो मिली

© Muntazir
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