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Poetry (Hindi-Urdu)

हम फ़ैज़ की नज़्में

आज़ाद वतन में आज़ादी का नारा फिर से गूंज रहा
सड़कों कूचों चौराहों पर बार इक फिर निकल हुजूम रहा
ये ज़मीं हमारा घर यहीं हम आशियां बनाएंगे
हम फ़ैज़ की नज़्में गाएंगे

है हक़ हमारा जो उसको तुम छीन नहीं हमसे सकते
वाबस्ता है जो हमसे वो कर दूर नहीं हमसे सकते
तुम ज़ोर लगा लो पूरा हम अपनी आवाज उठाएंगे
हम फ़ैज़ की नज्में गाएंगे

है ढला नहीं अब तक सूरज तुम रात नहीं ला पाओगे
तुमसे ऊपर एक गद्दी है कब तक यूं जुल्म बढ़ाओगे
हम हर एक मोड़ मकान बस्ती को शाहीन बाग़ बनाएंगे
हम फ़ैज़ की नज्में गाएंगे


آزاد وطن میں آزادی کا نعرہ پھر سے گونج رہا
سڑکوں کوچوں چوراہوں پر بار اک پھر نکل ہجوم رہا
یہ زمیں ہمارا گھر یہیں ہم آشیاں بنائینگے
ہم فیض کی نظمیں گائینگے

ہی حق ہمارا جو اسکو تم چھین نہیں ہمسے سکتے
وابستہ ہے جو ہمسے وہ کر دور نہیں ہمسے سکتے
تم زور لگالو پورا ہم اپنی آواز اٹھائینگے
ہم فیض کی نظمیں گائیںگے

ہی ڈھلا نہیں اب تک سورج تم رات نہیں لا پاؤگے
تم سے اوپر اک گدّی ہے کب تک یوں ظلم بڑھاؤگے
ہم ہر اک موڑ مکاں بستی کو شاہین باغ بنائینگے
ہما فیض کی نظمیں گاینگے


© Muntazir
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