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Poetry (Hindi-Urdu)

है कौन सा

है कौन सा सुकून जो इबादत से बड़ा है
उससे ज्यादा खुश है कौन जो मस्जिद में खड़ा है

कुरआन का हर लफ्ज़ इक अनमोल तोहफा है
इससे कीमती अल्मास कहां धरती में गड़ा है

सजदे से उठा है अभी वो अब्द अल्लाह का
नमाज़ के हर निशान में कैसा नूर जड़ा है

कितना पाक ओ ताहिर कितना नेक है वो दिल
जो दूसरों के ग़म में रो बच्चे सा पड़ा है


ہی کونسا سکون جو عبادت سے بڑا ہے
اسسے زیادہ خش ہے کون جو مسجد میں کھڑا ہے

قرآن کا ہر لفظ ایک انمول تحفہ ہے
اسسے قیمتی الماس کہاں دھرتی میں گڑا ہے

سجدے سے اٹھا ہی ابھی وہ ابد اللہ کا
نماز کے ہر نشان میں کیسا نور جڑا ہے

کتنا پاک او طاہر کتنا نیک ہے وہ دل
جو دوسروں کے غم میں رو بچّی سا پڑا ہے

 

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नफ़रत के सभी

नफ़रत के सभी फूल बे-मौसम ही झड़ गए
मुनफ़िक़ों के आशियाने बस कर भी उजड़ गए

हक़ बात सुनकर जो मुंह मोड़ लेते थे
सतून उनके घरों के एक-एक कर उखड़ गए

हमने तो बस ज़िक्र-ए-हश्र किया था
न जाने उनके मिज़ाज क्यों बिगड़ गए

नेमतें ख़ुदा से इतनी मिली
कि गिनने बैठे तो तारे कम पड़ गए


نفرت کے سبھی پھول بے موسم ہی جھڑ گئے
منفقوں کے آشیانے بس کر بھی اجڑ گئے

حق بات سنکر جو منہ موڑ لیتے تھے
ستون انکے گھروں کے ایک ایک کر اکھڑ گئے

ہمنے تو بس ذکرے حشر کیا تھا
نا جانے انکے مزاج کیوں بگڑ گئے

نعتیں خدا سے اتنی ملی
کی گننے بیٹھے تو تارے کم پڑ گ

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अश‌आर

क़ासिद किस पते पर लाएगा ख़त मेरा
मेरे घर ने मुझे बाहरी एलान कर दिया

قاصد کس پتی پر لائیگا خت میرا
میرے گھر نے مجھے باہری اعلان کر دیا

सांझ में सहर को उसने सदा दी थी ख़ता की थी
साफ़ लफ़्ज़ों में उसने ख़ामियां अपनी बता दी थी

سانجھ میں سحر کو اُسنے صدا دی تھی خطا کی تھی
صاف لفظوں میں اسنے خامیاں اپنی بتا دی تھی

ए बशर देखते हो क्या निगाह-ए-मुतजसस यूं तुम
तुम्हारा ही कफ़न तैयार तो शह-ज़ोर करते हैं

اے بشر دیکھتے ہو کیا نگاہیں متجسس یوں تم
تمہارا ہی کفن تیار تو شہ-زور کرتے ہیں

फ़क़त चाहने से होता यहां कुछ भी नहीं
न चाहते हुए भी आंसू छलक जाते हैं

فقط چاہنے سے ہوتا یہاں کچھ بھی نہیں
ن چاہتے ہوئے بھی آنسو چھلک جاتے ہیں

 

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हम फ़ैज़ की नज़्में

आज़ाद वतन में आज़ादी का नारा फिर से गूंज रहा
सड़कों कूचों चौराहों पर बार इक फिर निकल हुजूम रहा
ये ज़मीं हमारा घर यहीं हम आशियां बनाएंगे
हम फ़ैज़ की नज़्में गाएंगे

है हक़ हमारा जो उसको तुम छीन नहीं हमसे सकते
वाबस्ता है जो हमसे वो कर दूर नहीं हमसे सकते
तुम ज़ोर लगा लो पूरा हम अपनी आवाज उठाएंगे
हम फ़ैज़ की नज्में गाएंगे

है ढला नहीं अब तक सूरज तुम रात नहीं ला पाओगे
तुमसे ऊपर एक गद्दी है कब तक यूं जुल्म बढ़ाओगे
हम हर एक मोड़ मकान बस्ती को शाहीन बाग़ बनाएंगे
हम फ़ैज़ की नज्में गाएंगे


آزاد وطن میں آزادی کا نعرہ پھر سے گونج رہا
سڑکوں کوچوں چوراہوں پر بار اک پھر نکل ہجوم رہا
یہ زمیں ہمارا گھر یہیں ہم آشیاں بنائینگے
ہم فیض کی نظمیں گائینگے

ہی حق ہمارا جو اسکو تم چھین نہیں ہمسے سکتے
وابستہ ہے جو ہمسے وہ کر دور نہیں ہمسے سکتے
تم زور لگالو پورا ہم اپنی آواز اٹھائینگے
ہم فیض کی نظمیں گائیںگے

ہی ڈھلا نہیں اب تک سورج تم رات نہیں لا پاؤگے
تم سے اوپر اک گدّی ہے کب تک یوں ظلم بڑھاؤگے
ہم ہر اک موڑ مکاں بستی کو شاہین باغ بنائینگے
ہما فیض کی نظمیں گاینگے


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फिर हवाओं में

फिर हवाओं में वही आवाज़ सुनाई देती है
वही आवाज़ जो भीड़ में भी तन्हाई देती है

जैसे बुझने से पहले लौ कुछ तेज़ दहकती है
कि ज़मीं पर गिरती पत्तियां अंगड़ाई लेती हैं

निकहत तो आती है‌ हवा के हल्के झोंकों से
आंधी बस चमन-ओ-बाग़ तबाह कर देती है

चमकते सूरज की गर्मी से उसका क्या लेना
वो तो लाश-सी किसी मदफ़न में लेटी है

सुनसान गलियां डरा देती हैं आज भी उसे
हर चीख़ में उसे अपनी चीख़ सुनाई देती है


پھر ہواؤں میں وہی آواز سنائی دیتی ہے
وہی آواز جو بھیڑ میں بھی تنہائی دیتی ہے

جیسے بجھنے سے پہلے لو کچھ تیز دہکتی ہے
کی زمیں پر گرتی پتیاں انگڑائی لیتی ہیں

نکہت تو آتی ہے ہوا کے ہلکے جھونکوں سے
آندھی بس چمن-او-باغ تباہ کر دیتی ہے

چمکتے سورج کی گرمی سے اسکا کیا لینا
وہ تو لاش-سی کسی مدفن میں لیتی ہے

سنسان گلیاں ڈرا دیتی ہیں آج بھی اسے
ہر چیخ میں اس اپنی چیخ سنائی دیتی ہے


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नमाज़

गूंजती है फिज़ा में जब फ़जर की अज़ान
पाक रूहानियत में गिरफ्तार हो जाता है जहान
ठंडी हवा जो बहती है हौले-हौले
हम तक पहुंचाती है खुशबू-ए-अमान

सारा जहां झुका लेता है सजदे में सर
फूल पत्ते नन्हीं चिड़िया नहर-ओ-शजर
हाथ उठ जाते हैं खुद-ब-खुद दुआ में
जुबां पर रहता है बस अस-समद का ज़िकर

कामों में उलझे इब्न-ए-आदम वफ़ूर
इस जहां की दौड़ में होने लगते हैं चूर
याद दिलाने कि सफर ये आख़रत का है
फैल जाता है मस्जिदों से अज़ान-ए-ज़ुहर का नूर

साथ झुकते हैं सर सारे उठते हैं हाथ
ज़िक्र होता है अल्लाह का दुरूद-ए-रसूल पाक
इस जहां की चमक में न खो जाए हम कहीं
दिखाती हैं‌ सिरातुल मुस्तकीम कुरआन की आयत

कभी फ़ुर्सत मिले तो पल-दो-पल को बैठ जाना
मूंदकर आंख छांह-ए-दरख़्त में ग़ाएबाना
अलसाई धूप की बाहों में खुद को खोकर
कभी सुनना क़ुदरत का पुर-अमन अफ़साना

बेदार होगे तब उस नींद से जो बरसों से थी
सलात-ए-अस्र में हो जाएंगी नम आंखें यूं हीं
सफर ये मुश्किल है हैं हम यहां जबतक मुसाफ़िर
सुजूद-ओ-क़ुनूत में है रियायत न और कहीं

सूखे लबों पे नाम अल्लाह सुभानअल्लाह
प्यासे हलक़ में प्यास अल्लाह सुभानअल्लाह
सहर से तिश्नगी में जिनकी थे सब भूल बैठे
सुन मग़रिब की अज़ान कहे हर जर्रा सुभानअल्लाह

वो सुकून आला है दुनिया के सुखों से सारे
सब्र-ओ-इबादत में सराबोर क़ल्ब-ए-गेहवारे
जो नज़दीक अल्लाह के सबसे ये है वो निकहत
हो जाते हैं ताहिर हर नफ्स जैसे गुल-पारे

ये दुनिया का फ़ल्सफ़ा यही है मरकज़-ए-हयात
बाद दिन के आनी ही है काली अंधेरी रात
न डर जाए कहीं रात से अब्द-ए-अल्लाह
अय्याम-ए-इशा लेकर आता है तबर्रुकात

शुक्र अल्लाह अर-रहमान अस-समी अल-बशीर
वो मालिक हैं सबके जहां-ओ-अख़ीर
हमें तौफ़ीक़ दें हिदायत-ओ-करम
हो रोज़-ए-हश्र में हिसाब या अल्लाह मुनीर

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दर-ब-दर

दर-ब-दर जो भटकती रही उम्र-भर
जब हुआ खत्म उसका जहां में सफर
किसी मस्जिद की चौखट पे थी वो मिली
फूल मुरझा के भी वो मुरझाया न था
नूर ऐसा था जैसे सहर की कली
रंग उजला न था पर थी पाकीज़गी
नील अंबर सी चादर में लिपटी पड़ी
कई बेनाम शामों सी ढल वो गई
शाम सी ढल गई जो कभी थी सुबह
दयार-ए-काफ़िर में रिश्तों से जकड़ी हुई
एक गुमनाम जीवन वो जीती रही
उसकी क्या गलती थी क्या था उसका गुनाह
क्यों वो तपती रही क्यों पिघलती रही
गर नहीं चाहा उसने दिखाना जहां को
कितना खूबसूरत खा़लिक़ ने बनाया था उसको
क्यों अपनों के कदम पीछे हटने लगे
उसके पर्दे पर उंगलियां क्यो उठने लगी
फ़ज्र ज़ुहर अस्र मग़रिब इशा की अज़ान
सब वो सुनती रही पर न कुछ कर सकी
उन पलों में कैसे हर पल वो घुटती रही
आँसू भी तो न सकती थी वो दिखा
झूठी मुस्कुराहट से सिलकर वो होंठ
बस सिसकती रही बस सिसकती रही
कौन अंसार है आज के दौर में
उस‌ मुहाजिर को क्यों कोई देता बसर
दर-ब-दर वो भटकती रही उम्र भर
जब हुआ खत्म उसका जहां में सफर
किसी मस्जिद की चौखट पे थी वो मिली

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शजर-ए-दुनिया

ये रात गुज़र जाएगी कल कौन जाने
उम्र के बाकी हैं कितने पल कौन जाने

कैफ़िय्यत-ए-हयात-ओ-नफ्स ताहिर हो
उल्फ़त-ए-दुनिया है तिलिस्म हल कौन जाने

आफताब बन सको तो रौशन है ज़माना
पराई चमक पर माहताब का बल कौन जाने

नील-सा निकलो जो बयाबां से तो बात भी है
वगर्ना वीरानों में सूखे पड़े नल कौन जाने

मुहब्बत पाकीज़ा वही है जो ख़ुदा से हो
इश्क़ की आग में जलना है तो जल कौन जाने

शुआ-ए-ज़र-ओ-आस ज़िक्र-ए-अल्लाह से है
शजर-ए-दुनिया में क्या रखा है फल कौन जाने

हर गाम पर फ़रेब है इस सफर में मुसाफिर
फितरत है मुनाफ़िक़ का छल कौन जाने

एक कैद है दुनिया ये मरसिया है जिंदगी
सजी है बिखरे अशआरो से ग़ज़ल कौन जाने

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काली स्याही से

काली स्याही से मंज़र में खून के छींटे
रात है लेकिन बहना भी ज़रूरी है

फीके उजियालों तक के नाकाम सफर में
संग कौन है जाने क्या कितनी दूरी है

ग़ैर-मुमकिन तो नहीं मैं डूब जाऊं
दास्तां मेरी अधूरी थी अधूरी है

धुआं धुआं हसरतें उड़ने लगी हैं जा-ब-जा
शबिस्तां में मुस्कुराना इक मजबूरी है

माहताब मुंतज़िर है सितारों का
मेरी शब-ओ-शाम बिन जुगनू ही पूरी है

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पशेमां सी इक लड़की

पशेमां सी इक लड़की
किसी क़ब्र किनारे बैठी है
आहिस्ता आहिस्ता
बंद धड़कनों को सुनती है
तदबीरें सब खो सी गई हैं
मुनसिफ एक मुनाफ़िक़ है
सारी ज़मीं ही मक़्तल है
अब कौन यहां पर हाफिज है
दाइम कर्ब-ए-मुसलसल है
खुशियों की ख़लल है कभी-कभी
सिसकियां जनाब यहां हैं ख़ू
बरसों से दफ़्न ताइर-ए-सुकून

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